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WORD WIZARDRY

Word Wizardry

Mann Ka Makaan

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 मन ने मकान बनाया था

ज़मीन-ए-ज़िन्दगी पे कुछ साल पहले।
वहां नींद, जज़्बात, ख्वाब और फ़िक्र,
साथ किराये पे रहते थे।

भले एक ही जगह थी
जहाँ चारों का बसेरा था।
मगर चारों के मिज़ाज,
एक दूसरे से अलग थे।

सब सुकून से रहते थे।
पर नींद से किसी की नहीं बनती थी।
फ़िक्र, जज़्बात और ख्वाब तीनों को
नींद, नागवार थी।

नींद तो बदइख़लाक़ हमेशा से थी।
ज़्यादातर रातों में कहीं भागी रहती थी।
और रात भर उसके इंतज़ार में,
फ़िक्र जागा करती थी।

जज़्बात और नींद दोनों को,

एक दूसरे से इतनी रंजिश थी
की जहाँ जज़्बात रहे वहां नींद नहीं
और नींद रहे तो जज़्बात नहीं।

ख्वाब से भी इस नींद की
अजीब अनबन चलती थी।
ख्वाब नींद को चैन न आने दे,
तो नींद ख्वाब को बेसूकून करे।

पर एक माजरा ये भी था।
सबसे पहले इस मकान में
नींद ही बसने आयी थी
उसको बेदखल करना भी मुश्किल था।

नींद की अक्सर गैरमौजूदगी से
मन के मकान में खलबलि रहती थी।
और इलज़ाम -ए-जुर्म हर बार
बाकी तीनों पे लगता था।

ख्वाब के कई दोस्त थे।
कहीं बाहर से मिलने आते थे।
अक्सर उसके साथ में,
कोई “निराशा” रहा करती थी।

मोहब्बत इतनी मज़बूत थी,
ख्वाब और निराशा की;
की इधर ख्वाब कुछ करने चले,
उधर निराशा तुरंत साथ हो ले।

जज़्बात सबसे खुशमिज़ाज था।
हर किसी के लिए मौजूद था।
अक्सर वो भी यूँ ही।
कई दिलों से मिलने जाता था।

एक वक़्त के बाद मगर ऐसा हुआ
दिल के अंदर कुण्डी लगा के
उसने खुद को अंदर बंद कर लिया।
और अरसों तक बाहर नहीं आया।

थोड़ा सा डरने लगा वो;
ज़माने से घुलने मिलने से।
जो दिलों का वज़न बढ़ाया करता था,
वो न जाने किस बोझ तले दब गया।

और फ़िक्र, वो तो बड़ी अजीब थी।
बेवक़्त बिना बात छत से झांकती थी।
हरदम मुँह लटकाये, पीछे हाथ बांधे,
वो इधर उधर टहला करती थी।

न जाने अपने साथ फ़िक्र,
कितनी बरबादियाँ ले के आयी।
वो खुद तो डूब ही रही थी;
बाकी तीनों को भी लिए जा रही थी।

पर सबसे ज़्यादा वक़्त घर को,
फ़िक्र ने ही दिया है हमेशा।
बाकी सब तो आते जाते रहे,
ये कभी घर से बहार ही नहीं गयी।

सब कितने अलग थे,
पर फिर भी साथ रहते थे।
और सालों से किसी ने भी;
किसी का भी साथ नहीं छोड़ा।

पर ये कुछ “इंसान” नाम के जीव थे।
वो सारे दीखते तो एक ही जैसे थे।
फिर जाने क्यों ऐसा होता था,
वो एक दूसरे का साथ नहीं दे पाते थे।

खैर, एक रोज़ एक तूफ़ान आया,
और मन का ये मकान गिर गया।
तहस नहस हो गया सब झटके में।
और सबको ये घर छोड़ना ही पड़ा।

नींद, जज़्बात, ख्वाब और फ़िक्र
फिर भटक रहे हैं इधर उधर
एक पनाह की तलाश में
एक नए मकान की तलाश में।

मन ने मकान बनाया था
ज़मीन-ए-ज़िन्दगी पे कुछ साल पहले
वहां नींद, जज़्बात, ख्वाब और फ़िक्र,
साथ किराये पे रहते थे।

– 🌹कार्तिक मिश्र🌹

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LIFESTYLE

Poetry

Fan-PostPoetry

लोग क्या सोचेंगे ?

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लोग क्या सोचेंगे???

बहुत सुना है सबसे अपनों से परायों से!! लोग क्या सोचेंगे…??

इसकी शुरुआत का कोई अंदाज़ा नहीं

हाँ पर चाहें तो अंत ज़रूर हो सकता है क्या कभी सोचा है!!

कितने अरमां दब गए? कितनी उम्मीदें ख़त्म हो गईं?

कितने रंग बेरंग हो गए? बस इसलिए!! कि लोग क्या सोचेंगे?

पापा! वो लाल कपड़ा कितना सुंदर है! दिला दो! मैंने देखा है टीवी पे पहने हुए। क्या? वो घुटने तक का?

और बिना बाहों का?

अंग प्रदर्शन नहीं करवाना है हमको सलवार क़मीज़ पहनो, लोग क्या सोचेंगे देखो,

फिर भी वो झेलती रही रोज़ रास्ते में उन बेपरवाह, बेग़ैरत, नामर्दों की बदसलूकी…

क्यूँकि माँ ने कहा था अच्छे घर की बेटियाँ ऐसे जवाब नहीं देतीं वरना!

लोग क्या सोचेंगे वो कभी कह ही नहीं पाई कि उसे और पढ़ना है आगे बढ़ना है,

आसमान छूना है कैसे कहती? इतने ऊपर उठने की बात जो थी लो!

अब लोग क्या सोचेंगे उसे भी प्यार हुआ,

दिल उसका भी बेक़रार हुआ कैसे बताती सबको, एक डर था!

हाय, लोग क्या सोचेंगे हिम्मत करके, बहुत डर के बोली,

पसंद है उसे कोई पर ऐसे हमारे यहाँ शादियाँ नहीं होती, समझी?

लोग क्या सोचेंगे? चलो, बसा लिया उसने घर जहाँ तुमने कहा था अब?

जो हाथ उसपे उठता है रोज़ उससे कैसे बचाओगे?

क्या रोज़ रोज़ दहेज की माँग पूरी कर पाओगे?

नहीं! बेटा घर की बातें घर तक ही रखनी चाहिए वरना, लोग क्या सोचेंगे?

पहली बार ख़ुश हुई, माँ जो बनने वाली थी एक नयी ज़िंदगी को जन्म देने वाली थी पर देखो,

लड़का हो जाता तो ठीक था वरना, लोग क्या सोचेंगे? कब तक? आख़िर, कब तक??

जिन लोगों का सोच कर रुक जाते हैं आपके क़दम वो तो

फिर भी सोचेंगे आप अपनी सोच बदल कि देखिए इस बार लोग कब तक सोचेंगे?

उसे भी ख़ुश रहने का हक़ दो लोगों को जो सोचना है सोचने दो बंद कर दो

उनकी परवाह करना ख़ुशियाँ आपके अपने की हैं अगर अपने ही होंगे तो नहीं सोचेंगे उड़ जाने दो उसे

, छूने दो आसमान बदल दो अपनी सोच! फिर देखना, लोग क्या सोचेंगे ये लोग हैं,

इनके लिए जान भी दे दो फिर भी ये अपना ही सोचेंगे

मतलब कि इस युग में कोई पूछने नहीं आता ज़माना ऐसा ही है ज़नाब सबका

भला करके भी लोग कोसेंगे इससे अच्छा है कि खुल के जियो सोचने दो, जो लोग सोचेंगे!!

 

– अग्रिमा अवस्थी

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Poetry

College life

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We entered into a world that was new,
To find out that we were the chosen few;
All the things around were strange and queer,
But something inside said that there was nothing to fear.
Time progressed neat and clear,
Reminding us that the end was near;
Looking back to the days gone by,
Gives us a reason to cherish and cry.
We struggled hard to give our best,
So that in peace and calm, we may rest.
We wept when the days were bad,
Friends were the family then who made us glad.
We enjoyed bunking boring classes,
Canteen was the place where we shared many gossips.
We met people who made us blush,
Not longer did we realize that we had a crush.
Days and weeks, we sat and listened,
Only to realize that nothing has glistened;
We longed for the days that were to come,
Our hopes clinged onto reasons that were some.
We had our days under the sun,
Which were nothing but full of fun.
With every passing day, we near the end,
We longed for the past that we could mend.
With hope and despair equally spread,
Its the world outside that we dread;
But like the rosy days that we discuss,
All this could pass without any fuss.
The world we knew was full of high – fives,
Needless to say, those were the best days of our lives.

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Poetry

Silence speaks

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It whispers something softly until I smile,
And leads me in a state of bliss for a while.

It tells me my mistakes loud and clear,
And helps me bravely fight my fears.

It consoles me when I’m low and distressed,
It’s soothing voice helps me when I’m stressed.

It shares with me the memories of the past,
Whether good or bad, memories of contrast.

It handles the problems that come in way,
It forces them for not making a stay.

Louder than words it speaks,
Deeper than voice it sounds,
It awakes the sleeping seeker in me,
Its nothing but silence that talks so loud…

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Poetry

UNDYING LOVE OF A MOTHER

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From the very beginning of this life,

You were the one who stood by my side.

You gave me birth, taught me everything,

Today I think what good have I made you bring.

Holding my hands, you taught me to walk,

I don’t know how fast has time hit the clock.

You covered all my lies,

And saved me from all those silly fights.

When I was low, you made me strong,

I don’t know this much will how can someone hold on.

You are the one who manages it all,

From kitchen’s mess to dad’s cholesterol.

Never you complained,

Never were you tired,

Never were you lazy,

Never you retired.

Away from home in this big city,

You are the one like whom I want to be.

My silence only you understood,

When I was distressed and low in childhood.

Sleeping in your laps seemed heaven for me,

Nowhere else could this comfort ever be.

I know I made many mistakes,

Not listening to you and acting so fake.

But today everything I’ve realized mom,

You are the one who has made me so strong.

You are my hero mom,

All you taught I will always carry along.

You are truly a gift from God above,

Only he could have made you with so much love.

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Everything is fine

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