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Hindi Poetry

Fan-PostHindi Poetry

SUBAH HO GYI

1 (1)

ख़ामोशी में भीगी
वो तूफ़ानी काली रात थी।
न तुमने कुछ कह,
न मेरी बातों में कोई बात थी
काँपते शब्द,
तुम्हारे दिल में तैरते दर्द का एक पैग़ाम थे।
रुके कदम मेरे,
उस मोहब्बत का फ़रमान थे।
न तुम कुछ कह सके,
और मेरे लब भी कुछ शांत थे।
तड़प रहे थे हमारे दिल एक दूसरे के लिए,
क्या तुम, इस बात से अनजान थे?
पास आना था हमें,
पर और दूर हम जाते रहे।
बहुत कुछ कहना था हमें,
पर कुछ खामोशियाँ बढ़ाते रहे।
टूट कर इश्क़ किया,
पर टूटने से डरते थे।
नज़रें तो मिलाना चाहते थे,
पर वादे करने से मुकरते थे।
वो तूफ़ानी रात की हवाएं कुछ ऐसी थीं,
जो चाहती हमारा साथ थीं।
पर एक दूसरे का दर्द देखते देखते सुबह हो गयी।

 

– ARADHYA AWASTHI

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Hindi Poetry

Pyaar ke naam

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तेरी जुल्फों का पहरा, तेरी आंखों सा गहरा ,
तेरी बातें नशीली , तेरा मासूम चेहरा ।
तू जो बाहों में आये, घड़ी रुक सी जाये ,
तेरा मुस्कुराना कयामत सा ढाये ।
तू है एक कली या लड़ी, फुलझड़ी है,
कोई देखे तुझको तो दिल को आफ़त बड़ी है।
तेरी फिक्र हर पल,तेरा ज़िक्र हरदम,
तेरे पास आने के लमहे तो हैं कम ।
मगर उन पलों को है रक्खा समेटे,
भीग जायेगी आंखें उन्हें पलकों में लेके ।
रहना खुशी से तू रहना जहां पर ,
करेगा दुआएें ये आशिक यहां पर ।

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Hindi Poetry

Dil lagakar aaye ho na

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सुर्ख़ क्यों है ये आंखें तेरी?

क्या रात भर तुम सोये नहीं?

या फ़िर क्या ऐसा हुआ, की

चाह कर भी तुम रोये नहीं?
क्या कहना चाहती हैं निगाहें?

ज़ुबाँ पे यूँ ताले क्यों हैं?

अनकही, बयां करने में,

लफ़्ज़ों के लाले क्यों हैं?
बुझा, दबा सा क्यों है आज

जगमग सा रुख़सार तेरा?

चेहरे की वो हंसी कहाँ है?

क्यों है मन बेज़ार तेरा?
सच में ताक़त नहीं बची

या उठना ही नहीं चाहते हो?

दवा नहीं कोई, या घावों को

भरना ही नहीं चाहते हो?
झुकाये गर्दन, ज़मीं पे यूँ

क्यों नज़र गड़ाए बैठे हो?

ऐसे वीराने में,

किसकी आस लगाए बैठे हो?
हाथ सच में ख़ाली हैं

या इनमें है कोई नाकामी?

बड़े बेसुकूँ लगते हो?

क्यों है ये बेआरामी?
थक के चूर बैठे हो?

या फिर, तुम पगलाए हो क्या?

साँसे फूल सी क्यों रही हैं?

मीलों चल कर आये हो क्या?
मुस्कुराहट के अड्डे पे

क्यों मायूसी छाई है?

ये इतनी घबराहट तुम तक

कहां से चल कर आई है?
अब कह भी दो कहीं पे अपना

सर झुका कर आये हो न?

चुप्पी के दामन में कोई

बात छुपा कर लाये हो न?
तुम तो बिल्कुल ग़मगीनी का

मन बना कर आये हो न?

अब तो सच तुम कह ही दो

दिल लगा कर आये हो न?
– 🌹कार्तिक मिश्र🌹

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Hindi Poetry

इन बादलों में कुछ कश्मीर सा है।

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इन बादलों में कुछ कश्मीर सा है।

अँधियारा है कुछ इनमे भी।

गर्म है सरहद कुछ, इनकी भी।

और लगता उड़ते अबीर सा है।

इन बादलों में कुछ कश्मीर सा है।
सबकी निगाहें टिक सी जाएं,

ऐसा दिलकश है नज़ारा।

जंग छिड़ी इस बात की भी,

ये है तुम्हारा या हमारा।

ये ऐसा बेनज़ीर सा है।

इन बादलों में कुछ कश्मीर सा है।
कुछ उस बड़े मकां सा है,

जिसमे पड़ोसी झांकता है।

किसी के सर के ताज सा है

जिसपे, दूजा हक़ मांगता है।

दिखने में बड़ा अमीर सा है।

इन बादलों में कुछ कश्मीर सा है।
समंदर की लहरों सा है,

ऊंची नीची तक़दीर सा है।

शांत बड़ा है बाहर से,

अंदर ये आतिशगीर सा है।

ये सपना है, हक़ीक़त है,

या बस एक तस्वीर सा है।

इन बादलों में कुछ कश्मीर सा है।

 

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Word Wizardry

Shamshaan

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ये वो जगह है

जहाँ किसी के अपनों पे

एक अजीब कलंक,

और महा-पाप

लगा दिया गया।
ये वो जगह है जहाँ

दिलों में जिंदा

एक आत्मा को,

मरा शरीर बता कर

जला दिया गया।
शिकायतों की बली है ये

और अल्फ़ाज़ों का रमज़ान।

इस बदनसीब ज़मीन पे है

जलाने का सामान।

ये वो एक मंज़र है, जिससे

कई होंगे अनजान।

जिसे याद करना भी मुश्किल,

और भूलना भी नहीं आसान।
“शमशान”
ये गालों की घाट पे बहती

आसुओं की नदी है।

ये पल भर में गुज़री हुई,

एक पूरी सदी है।

ये जगह एक ऐसी

मुक्त आत्मा का घर है,

जो ज़मीन से छूट गयी,

पर यादों से बंधी है।
देखो ये जगह,

यहां सैकडों मरे पड़े हैं।

सब यहां आ के,

अपने आप से ही लड़े हैं।

इधर कोई अपने पिता से

माफी मांग रहा है।

उधर माँ को जलता देखते

बेबस बेटे खड़े हैं।
यहां थमे से वक़्त में

सब मीलों चला करते।

यहां तपती हुई रेत पे भी

पांव नही जला करते।

बेबस बाज़ुओं को देख

मन कैसे दम देता है।

इन अर्थियों पे सिर्फ

शरीरों के बोझ नहीं रहा करते।
ये एक का किस्सा सुनाया

अभी मैंने तुम्हें बस।

यहां तो ये सब बातें

सुबह शाम चलाती हैं।

यहां पे तो, एक पल में

कोई राख ठंडी पड़ती है।

और दूजे पल में उसी जगह

एक और लाश जलती है।
यहां पे हर चीज़ से

मन हट जाता है।

क्योंकि यहां मन भी

दो हिस्सों में बंट जाता है।

एक हिस्सा कहता है

“मुक्ति मेरे हाथों से दिलाओ”

और दूसरा हिस्सा कहता है

“ऐसा काम मुझसे मत करवाओ”।
नए सफ़र की शुरआत है ये

और ज़िन्दगी का सार है।

लकड़ियों का बिस्तर बनाना

भी, किसी के लिए प्यार है।

मग़र यहां पे तेरे भाव,

“किलो भाव” हो जाएंगे।

ये जगह भी बची नहीं,

यहां भी खूब व्यापार है।
यहाँ न कोई सुकून में है

न है कोई परेशान।

नीचे आंसुओं से नम ज़मीन

ऊपर यादों का आसमान।

जिसे याद करना भी मुश्किल

और भूलना भी नहीं आसान।

यही वो जगह है।

जिसे हम कहते “शमशान”।
– 🌹कार्तिक मिश्र🌹

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Mann Ka Makaan

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 मन ने मकान बनाया था

ज़मीन-ए-ज़िन्दगी पे कुछ साल पहले।
वहां नींद, जज़्बात, ख्वाब और फ़िक्र,
साथ किराये पे रहते थे।

भले एक ही जगह थी
जहाँ चारों का बसेरा था।
मगर चारों के मिज़ाज,
एक दूसरे से अलग थे।

सब सुकून से रहते थे।
पर नींद से किसी की नहीं बनती थी।
फ़िक्र, जज़्बात और ख्वाब तीनों को
नींद, नागवार थी।

नींद तो बदइख़लाक़ हमेशा से थी।
ज़्यादातर रातों में कहीं भागी रहती थी।
और रात भर उसके इंतज़ार में,
फ़िक्र जागा करती थी।

जज़्बात और नींद दोनों को,

एक दूसरे से इतनी रंजिश थी
की जहाँ जज़्बात रहे वहां नींद नहीं
और नींद रहे तो जज़्बात नहीं।

ख्वाब से भी इस नींद की
अजीब अनबन चलती थी।
ख्वाब नींद को चैन न आने दे,
तो नींद ख्वाब को बेसूकून करे।

पर एक माजरा ये भी था।
सबसे पहले इस मकान में
नींद ही बसने आयी थी
उसको बेदखल करना भी मुश्किल था।

नींद की अक्सर गैरमौजूदगी से
मन के मकान में खलबलि रहती थी।
और इलज़ाम -ए-जुर्म हर बार
बाकी तीनों पे लगता था।

ख्वाब के कई दोस्त थे।
कहीं बाहर से मिलने आते थे।
अक्सर उसके साथ में,
कोई “निराशा” रहा करती थी।

मोहब्बत इतनी मज़बूत थी,
ख्वाब और निराशा की;
की इधर ख्वाब कुछ करने चले,
उधर निराशा तुरंत साथ हो ले।

जज़्बात सबसे खुशमिज़ाज था।
हर किसी के लिए मौजूद था।
अक्सर वो भी यूँ ही।
कई दिलों से मिलने जाता था।

एक वक़्त के बाद मगर ऐसा हुआ
दिल के अंदर कुण्डी लगा के
उसने खुद को अंदर बंद कर लिया।
और अरसों तक बाहर नहीं आया।

थोड़ा सा डरने लगा वो;
ज़माने से घुलने मिलने से।
जो दिलों का वज़न बढ़ाया करता था,
वो न जाने किस बोझ तले दब गया।

और फ़िक्र, वो तो बड़ी अजीब थी।
बेवक़्त बिना बात छत से झांकती थी।
हरदम मुँह लटकाये, पीछे हाथ बांधे,
वो इधर उधर टहला करती थी।

न जाने अपने साथ फ़िक्र,
कितनी बरबादियाँ ले के आयी।
वो खुद तो डूब ही रही थी;
बाकी तीनों को भी लिए जा रही थी।

पर सबसे ज़्यादा वक़्त घर को,
फ़िक्र ने ही दिया है हमेशा।
बाकी सब तो आते जाते रहे,
ये कभी घर से बहार ही नहीं गयी।

सब कितने अलग थे,
पर फिर भी साथ रहते थे।
और सालों से किसी ने भी;
किसी का भी साथ नहीं छोड़ा।

पर ये कुछ “इंसान” नाम के जीव थे।
वो सारे दीखते तो एक ही जैसे थे।
फिर जाने क्यों ऐसा होता था,
वो एक दूसरे का साथ नहीं दे पाते थे।

खैर, एक रोज़ एक तूफ़ान आया,
और मन का ये मकान गिर गया।
तहस नहस हो गया सब झटके में।
और सबको ये घर छोड़ना ही पड़ा।

नींद, जज़्बात, ख्वाब और फ़िक्र
फिर भटक रहे हैं इधर उधर
एक पनाह की तलाश में
एक नए मकान की तलाश में।

मन ने मकान बनाया था
ज़मीन-ए-ज़िन्दगी पे कुछ साल पहले
वहां नींद, जज़्बात, ख्वाब और फ़िक्र,
साथ किराये पे रहते थे।

– 🌹कार्तिक मिश्र🌹

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